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मनुष्य जन्म का उद्देश्य।

 भारतीय शास्त्रों के अनुसार मानव जीवन का परम उद्देश्य भगवान की प्राप्ति (मोक्ष/ईश्वर साक्षात्कार) ही माना गया है। इसके समर्थन में कुछ प्रमुख श्लोक नीचे सरल अर्थ सहित दिए जा रहे हैं — भगवद्गीता (अध्याय 7, श्लोक 19)
श्लोक:
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥

अनेक जन्मों के बाद ज्ञानी व्यक्ति मुझे प्राप्त करता है और समझता है कि भगवान ही सब कुछ हैं। ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ होता है।यह श्लोक बताता है कि अंततः जीवन का लक्ष्य भगवान की शरण लेना है। भगवद्गीता (अध्याय 18, श्लोक 66)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि भगवान की शरण ही मोक्ष का मार्ग है।. श्रीमद्भागवत पुराण (1.2.6)

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता यया आत्मा सुप्रसीदति॥
मनुष्य का सर्वोच्च धर्म वही है जिससे भगवान में निष्काम और अविच्छिन्न भक्ति उत्पन्न हो, जिससे आत्मा पूर्ण संतोष प्राप्त करे। इससे स्पष्ट होता है कि भक्ति ही जीवन की पूर्णता है। 4. कठोपनिषद (1.2.23)

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥

यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से और न अधिक सुनने से प्राप्त होती है; जिसे भगवान चुनते हैं वही उन्हें प्राप्त करता है।
 यह बताता है कि ईश्वर कृपा से ही प्राप्त होते हैं। 5. श्वेताश्वतर उपनिषद (6.23)

यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥

जिसके हृदय में भगवान और गुरु दोनों के प्रति समान भक्ति होती है, उसी को शास्त्रों के रहस्य स्वतः प्रकट होते हैं।
 इससे भक्ति और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग स्पष्ट होता है।

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